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IAS Special

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के बदलते आयाम

देश की आजादी के बाद हम लगातार विकास के पथ पर अग्रसर हैं। हम विकासशील से विकसित देश होने जा रहे हैं। हमने चिकित्सा, शिक्षा सहित हर क्षेत्र में तेजी से विकास किया है। चूंकि भारत एक ऐसा देश है, जहां की 73 फीसदी से अधिक आबादी गांवों में रहती है। लेकिन अभी तक गांवों में शहरों की अपेक्षा सिर्फ 15 फीसदी ही स्वास्थ्य सेवा पहुंच पाई हैं। इन सुविधाओं को बढ़ाने के लिए हमारी केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार सभी का ध्यान गांवों की ओर है। जब तक विकास योजनाओं की पहुंच गांवों तक नहीं होगी तब तक देश व समाज का भला नहीं हो सकता है। विश्व की कुल आबादी का 16.5 प्रतिशत भारत में है, लेकिन दुनिया की 20 फीसदी बीमारियां अकेले भारत में रहती हैं। दुनिया के श्वास संबंधी और कुपोषण संबंधी 20 फीसदी मरीज भारत में रहते हैं। ऐसे में यहां के लोगों की स्वास्थ्य सुरक्षा का समुचित प्रबंध होना भी एक बड़ी चुनौती है। हम इस चुनौती को लगातार स्वीकार कर रहे हैं और काफी हद तक कामयाब होते नजर आ रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से जब भी किसी योजना की घोषणा की जाती है तो सबसे पहले इस बात का ध्यान रखा जाता है कि इस योजना का गांवों पर कितना असर पड़ेगा। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कुछ ऐसा ही है। कुछ दिन पहले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साफतौर पर कहा कि जब तक ग्रामीण इलाके के लोगों को आधारभूत सुविधाएं नहीं मिलेंगी, उनके जीने का आधार पुख्ता नहीं होगा, उन्हें रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक देश व समाज का भला नहीं हो सकता है। उन्होंने साफ कहा कि हमने बजट के दौरान इस बात का खास ध्यान रखा कि योजनाओं की पहुँच गांवों तक हो। गांवों के विकास के लिए अतिरिक्त बजट का भी प्रावधान किया गया। लोगों के स्वास्थ्य की देखरेख के लिए भी अतिरिक्त बजट का प्रावधान किया गया है। सरकार का मानना है कि जब तक देश स्वस्थ नहीं होगा, तब तक स्वस्थ राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए बजट की डिमांड करने वाली सरकारों को बजट मुहैया कराया जाएगा। दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में पत्रकारों के सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय चिकित्सा मंत्री ने भी इस बात का दोहराया था कि राज्य सरकारें ग्रामीण इलाके में चिकित्सा सुविधा के विस्तार के लिए अपनी जरूरतें बताएं, सरकार उन्हें पूरा करेगी। इस तरह देखा जाए तो राज्य सरकार के अलावा केंद्र की ओर से भी ग्रामीण इलाके में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए लगातार कोशिश की जा रही है। हां, इतना जरूर है कि अभी तक देश में अंतिम छोर तक वह सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं, जिसकी दरकार है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की माने तो देश में 2083 लोगों पर एक चिकित्सक और छह हजार पर एक सहायक नर्स की नियुक्ति होनी चाहिए। शहरों में यह स्थिति तो बेहतर है, लेकिन ग्रामीण इलाके में अभी बहुत कुछ करने की गुजाइंश है। मानक के अनुरूप चिकित्सा सेवा नहीं पहुंच पाई है। केंद्र सरकार की ओर से भी तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जनसंख्या की दृष्टि से अभी भी कम पड़ रही हैं। जिन्हें और बेहतर बनाने की जरूरत है। सरकार की ओर से लगातार स्थिति में सुधार की कोशिश की जा रही है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो आजादी के समय जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष थी, जो अब करीब 66 वर्ष से अधिक तक पहुंच चुकी है। पहले चेचक, प्लेग, मलेरिया सहित अन्य बीमारियों से लाखों लोग दम तोड़ देते थे, लेकिन अब इन महामारियों के अलावा हम पोलियो को भी दूर भगाने में सफल रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े यह साबित करते हैं कि पहले जहां अकेले एक गांव में सैकड़ों लोग मरते थे वहीं अब मलेरिया से करीब 20 लाख की आबादी में एक या दो लोगों की मौत होती है। करीब-करीब यही स्थिति अन्य क्षेत्रों में भी है। फिर भी अभी हमें बहुत कुछ करना है, जिसके लिए हमारी केंद्र एवं राज्य सरकारें तत्पर हैं। आगे अगर हम मातृ सुरक्षा की बात करें तो गांव स्तर पर आशा की नियुक्ति की गई है। शत-प्रतिशत प्रसव चिकित्सालय में कराने की कोशिश चल रही है, लेकिन अभी इसमें सफलता नहीं मिल पाई है। तमाम चुनौतियों के बीच हमारे देश के लोगों की सेहत में लगातार सुधार हो रहा है। हमारी स्वास्थ्य सेवाएं कई विकसित देशों की अपेक्षा बेहतर परिणाम दे रही हैं।
प्रमुख चुनौतियां जनसंख्या नियंत्रण जनसंख्या की ही बात करें तो हमारे देश के एक प्रदेश की जनसंख्या उतनी है जितनी दूसरे विकसित देशों की। जनसंख्या के मामले में अकेले उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 16.6 करोड़ है, जबकि कनाडा की 3.1 करोड़, इटली की 5 करोड़, वियतनाम की 8 करोड़ और ब्राजील की 17 करोड़ के आसपास है। उत्तर प्रदेश की तरह महाराष्ट्र की 9.3 करोड़, बिहार की 8.3 करोड़, पश्चिम बंगाल आठ करोड़ के आसपास है। करीब-करीब अन्य बड़े राज्यों की भी स्थिति यही है। सबसे कम 0.8 करोड़ आबादी उत्तरांचल की बताई जाती है। ऐसे में जाहिर-सी बात है कि इतनी अधिक आबादी होने के बाद भी देश में सभी को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना एक बड़ी चुनौती है। इसे काबू करने के लिए तरह-तरह के अभियान चलाए जा रहे हैं।
कम उम्र में शादी-विवाह तेजी से जनसंख्या वृद्धि के पीछे मूल कारण था कम उम्र में शादी-विवाह हो जाना। समय के साथ लोगों के विचार में बदलाव भी आ रहा है और सरकार की ओर से चलाए जा रहे जागरुकता अभियान का भी असर पड़ रहा है। अब लड़के की उम्र 21 और लड़की की उम्र 18 वर्ष निर्धारित कर दी गई है। इससे कम उम्र में शादी होने पर वर एवं वधु दोनों पक्षों को दोषी माना गया है। पहले उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल सहित तमाम राज्यों में बहुत ही कम उम्र में विवाह कर दिया जाता था। एनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में 70फीसदी लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी जाती है। इसी तरह बिहार में 69, राजस्थान में 67, आंध्र प्रदेश में 63, पश्चिम बंगाल में 62, मध्य प्रदेश में 60, उत्तर प्रदेश में 59, छत्तीसगढ़ में 30, महाराष्ट्र में 52, कर्नाटक में 49, हरियाणा में 45, असम में 41, गुजरात में 41, उड़ीसा में 40, दिल्ली में 35, उत्तराखंड में 30, तमिलनाडु में 30, पंजाब में 23, केरल में 20, जम्मू में 19 और हिमाचल प्रदेश में 14 फीसदी लड़कियां 18 वर्ष की उम्र तक पहुंचने से पहले ही ब्याह दी जाती हैं। जाहिर-सी बात है कि ऐसे में वे न तो आत्मनिर्भर बन पाती हैं और न ही इनकी शिक्षा हो पाती है। छोटी उम्र में ही घर-परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ जाती है। फिर कुछ समय बाद ही वे मां बन जाती हैं। ऐसे में उनकी सेहत खराब होना और उनसे पैदा होने वाले बच्चे की सेहत का प्रभावित होना लाजिमी है। बाल विवाह के कारण जनसंख्या वृद्धि के साथ ही कुपोषण और मातृ-शिशु मृत्युदर को भी बढ़ावा मिला था, लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ कंट्रोल होता नजर आ रहा है।

लिंगानुपात कम होना
हमारे देश में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां तो कई हैं, लेकिन लिंगानुपात का तेजी से घटना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए हर किसी को आगे आना होगा। लिंग अनुपात में तेजी से आ रही गिरावट को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग की ओर से शिविर, सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है, लोगों को समझाया जा रहा है कि बालक एवं बालिका के विभेद को मिटा दे। सरकार की ओर से जागरुकता अभियान चलाए जाने एवं शिक्षा का प्रसार होने से इसमें काफी हद तक सुधार हुआ है, लेकिन अभी स्थिति संतोषजनक नहीं है। भारत में अभी भी स्त्री-पुरुष अनुपात 933 प्रति हजार है, जबकि रूस में 1140 तो जापान में 1040 प्रति हजार है। करीब-करीब यही स्थिति अन्य विकसित एवं विकासशील देशों की है। प्रदेशवार आंकड़े देखे जाएं तो सबसे खराब स्थिति हरियाणा की है। यहां एक हजार पुरुषों में सिर्फ 870 महिलाएं हैं। इसी तरह पंजाब में 879 हैं। उत्तर प्रदेश में 885, राजस्थान में 919, महाराष्ट्र में 937, गुजरात में 942, बिहार में 946, कर्नाटक में 963, आंध्र प्रदेश में 975, तमिलनाडु में 977, उड़ीसा में 981 और केरल में सर्वाधिक 1032 प्रति हजार हैं। यानी स्थिति स्पष्ट है कि हम केरल में सबसे अधिक जागरूक हैं, फिर भी यहां का आंकड़ा रूस की अपेक्षा कम है। अब सरकार की ओर से इस बात पर पाबंदी लगाई गई कि किसी भी डायग्नोसिस सेंटर पर भ्रूण की जांच नहीं की जाएगी। सभी डायग्नोसिस सेंटरों से इस आशय का हलफनामा भी लिया गया है और लगातार जांच की जा रही है। जांच में पकड़े जाने वाले सेंटरों के न सिर्फ लाइसेंस निरस्त किए जा रहे हैं बल्कि उनके खिलाफ सजा का भी प्रावधान किया गया है। इससे कुछ सुधार होने की उम्मीद है। साक्षरता बढ़ने के साथ ही लोगों के विचारों में बदलाव आ रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाला समय सुनहरा होगा और लिंग अनुपात की यह खाई काफी हद तक पट जाएगी।

पंचायतों को मिले अधिकार
भारतीय संविधान के 73वें संशोधन के दौरान पंचायतों को स्वास्थ्य, स्वच्छता की भी जिम्मेदारी दी गई। उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई कि वे पंचायत क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं की निगरानी करें, स्वास्थ्य योजनाएं बनाएं। लेकिन दुखद पहलू यह है कि ज्यादातर स्थानों पर पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में कुछ स्थानों को छोड़ दें तो ब्लॉक द्वार पर ही स्वास्थ्य केंद्र हैं। आयुर्वेद चिकित्सालयों की स्थिति खस्ताहाल है। ऐसे में पंचायतों को मिलने वाले इस अधिकार का क्या मतलब रह गया है। पंचायतों को अधिकार के साथ ही चिकित्सालय बनाने और उनमें चिकित्सक की नियुक्ति की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। सरकारी सभी रिक्त पदों को जल्द से जल्द भरे। चिकित्सकों के साथ ही दवाओं की भी व्यवस्था की जाए।
स्वास्थ्य सेवाओं में उत्तर प्रदेश की स्थिति

जागरुकता से मिली सफलता
स्वास्थ्य विभाग की ओर से शत-प्रतिशत संस्थागत प्रसव कराए जाने के अभियान में सबसे कारगर भूमिका जागरुकता अभियान की रही है। जब तक लोगों को संस्थागत प्रसव केफायदे बताए गए, उन्हें समझाया गया कि चिकित्सालय में प्रसव कराए जाने से जच्चा-बच्चा दोनों को लाभ होता है, लोग चिकित्सालयों की ओर रुख करने लगे हैं। पहले होता यह था कि प्रसव घर की अप्रशिक्षित महिलाएं ही कराती थी। इससे कई बार जच्चा तो कई बार बच्चे की मौत हो जाती थी। कई बार ऐसा भी होता था कि बच्चा पैदा होने के बाद साफ-सफाई तथा अन्य त्वरित समस्याओं के कारण दम तोड़ देता था। लेकिन चिकित्सालय में प्रसव होने की स्थिति में दोनों की जान को खतरा कम हो जाता है। सरकार के अभियान का असर कहें या लोगों की बदलती मानसिकता, कारण चाहे जो हो, लेकिन यह बात सच है कि संस्थागत प्रसव की संख्या बढ़ी है।

चिकित्सा सुविधाओं को बढ़ाने की जरूरत
अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो ब्लॉक स्तर पर ही प्राथमिक चिकित्सालय की व्यवस्था है। एक ब्लॉक में दो से ढाई सौ तक गांव हैं। ऐसे में लोगों को प्राइवेट चिकित्सालयों का सहारा लेना पड़ता है। जहां वर्ष 1994 में जन्मदर 36.8 और मृत्युदर 11.8 थी, वर्ष 1997 में जन्मदर 34.6 और मृत्युदर 10.7 पर पहुंच गई। उत्तर प्रदेश में ओपीडी में वर्ष 2005 में जहां 22 लाख मरीजों का इलाज किया गया वहीं 2008-09 में करीब 29 लाख मरीजों का इलाज किया गया। इससे जाहिर होता है कि अब लोगों में जागरुकता आई है और वे सरकारी चिकित्सालयों तक पहुंच रहे हैं; लेकिन अभी भी राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2001 की जनसंख्या के अनुरूप स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए अभी भी 700 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं 582 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की जरूरत है। गायनॉकालॉजिस्ट की जरूरत 515 है, जबकि कार्यरत सिर्फ 131 ही हैं। गंभीर बात यह है कि 7295 के सापेक्ष सिर्फ 3340 नर्स कार्यरत हैं। ऐसे में सरकार को यह चुनौती भी स्वीकार करनी चाहिए। जिस तरह से हम विभिन्न महामारियों को दूर करने में सफल रहे, उसी तरह जनसंख्या के अनुरूप चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार किया जाए; रिक्त पदों को भरा जाए; साथ ही ग्रामीण स्तर पर चिकित्सा केंद्र स्थापित करने की जरूरत है। जब तक गांव स्तर पर चिकित्सा केंद्र नहीं होंगे तब तक झोलाछाप चिकित्सकों का खात्मा नहीं किया जा सकेगा। क्योंकि सरकारी चिकित्सालय के दूर होने की स्थिति में ही ग्र्रामीण इलाके में झोलाछाप चिकित्सक लोगों का शोषण कर रहे हैं। ये चिकित्सा के नाम पर लोगों से मंुहमांगा दाम वसूलते हैं और एक रोग ठीक करने के बजाय दूसरे रोग दे देते हैं।

दिमागी बुखार को जड़ से खत्म करना जरुरी
पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर सहित आसपास का पूरा इलाका दिमागी बुखार से पीड़ित रहा। इस इलाके में दिमागी बुखार की जड़ें काफी गहरी हो गई हैं। इसे दूर करने के लिए सरकार की ओर से लगातार कोशिश की जा रही है, लेकिन बारिश होते ही यह फिर से सिर उठाने लगता है। इसकी रोकथाम के लिए लगातार अभियान चलाए जाने की जरूरत है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि काफी हद तक इस पर काबू पा लिया है। विभागीय आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2005 में जहां 5581 मामले सामने आए और 1577 लोगों की मौत हुई वहीं वर्ष 2007 में यह संख्या घटकर 2675 हो गई और सिर्फ 577 की मौत हुई। वर्ष 2008 और 09 में भी यह आंकड़े कम हुए हैं। हालांकि गोरखपुर के साथ ही देवरिया, बस्ती, श्रावस्ती आदि जिलों में इसके मरीज खूब पाए गए, लेकिन समय रहते इलाज हो जाने के कारण लोगों की मौत पहले की अपेक्षा कम हुई हैं। ऐसे में सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसे रोग को सिर्फ रोकने नहीं बल्कि उसके खात्मे के लिए भी कारगर कदम उठाए।
नकली दवाओें का कारोबार ग्रामीण इलाकों में नकली दवाओं का कारोबार भी खूब चलता है। कई बार चिकित्सक दूसरी दवा लिखते हैं और मरीज को थमा दी जाती है दूसरी। इस कारोबार के जरिए भी ग्रामीणों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। इसे रोकने के लिए राज्य में औषधि नियंत्रण विभाग की स्थापना की गई है। केंद्र सरकार के निर्देश एवं राज्य सरकार की ओर से भी समय-समय पर चैकिंग अभियान चलाया जाता है। इससे भी मरीजों को काफी राहत मिलती है। इन दिनों बाजार में नकली दवाओं का कारोबार कुछ ज्यादा हीफल-फूल रहा है। इस पर पूरी तरह से पाबंदी लगाने की जरूरत है चूंकि नकली दवाओं का कारोबार किसी एक प्रदेश में नहीं चल रहा है। करीब-करीब हर राज्य में नकली दवाओं का कारोबार फैल चुका है, जो लोगों की जान को जोखिम में डाल रहा है। अगर हम उत्तर प्रदेश के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2005-06 में यहां चले चैकिंग अभियान में 1817 नमूने लिए गए। इसमें 517 की जांच हुई और तीन नकली पाए गए। इसके आरोपी दो लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसी तरह वर्ष 2007-08 के दौरान यहां 755 नमूनों की जांच कराई गई, जिसमें 17 नमूनेफेल हुए और 64 लोगों की गिरफ्तारी हुई। आंकड़ों से साबित होता है कि ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए यह कारोबार भी काफी भ्रष्ट हो चुका है। इसे पूरी तरह खत्म करना जरूरी है।

अन्य योजनाएं
फिलहाल अन्य प्रांतों की तरह ही उत्तर प्रदेश में भी राष्ट्रीय कुष्ठ रोग नियंत्रण कार्यक्रम, राष्ट्रीय अंधता नियंत्रण, एड ्स नियंत्रण, क्षय नियंत्रण सहित कल्याण योजनाएं चल रही हैं। इन योजनाओं का ग्रामीणों को काफी हद तक लाभ भी मिल रहा है, लेकिन इन योजनाओं को और बेहतर बनाने की जरूरत है। जब तक सभी योजनाओं का लाभ ग्राम-स्तर पर लोगों को नहीं मिलेगा तब तक देश व समाज का भला नहीं हो सकता है। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह योजनाओं को लागू करने के साथ ही उसके क्रियान्वयन पर भी ध्यान दे क्योंकि विभागीय आंकड़ों से ही देश व प्रदेश की चमक नहीं लौटेगी। स्वास्थ्य सेवाओं को आम जन तक पहुंचाने के लिए मानीटरिंग की व्यवस्था दुरूस्त करनी होगी। अगर सरकारें यह कार्य करने में सफल रही तो निश्चित रूप से भारत का भविष्य उज्जवल होगा और प्रधानमंत्री की ओर से उम्मीदें पूरी हो सकेंगी।

 

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