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Nov 21st
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उत्तराखंड का संकट

छोट े राज्यां े और खासकर जहां कम संख्या वाली विधानसभा हाते ी है वहा ं राजनीतिक अस्थिरता किस तरह रह-रह कर सिर उठाती है, इसका ताजा उदाहरण है उत्तराखंड। हरीश रावत सरकार का भविष्य अधर मे ं है और इसलिए क्यांेि क खुद कांग्रेसी विधायकों ने ही बगावत की राह पकड़ ली है। विडंबना यह है कि बागी विधायकों में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी शामिल है। कांग्रेस ने विजय बहुगुणा को हटाकर हरीश रावत को इसलिए सत्ता की कमान सौंपी थी, क्योकि वह अपने ही विधायकों के असंतोष से जूझ रहे थे। अब इसी स्थिति से हरीश रावत दो-चार हैं।

उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद से सिर्फ एक बार किसी मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल को पूरा किया है। विधायकों के असंतोष के कारण भाजपा को भी मुख्यमंत्री बदलने पड़े और कांग्रेस को भी। चंूि क इन बदलावो ं मे ं जनता की कही कोई भूमिका नही ं रही इसलिए इस नतीज े पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नही ं कि जनादश्े ा की बार-बार अनदख्े ाी हुई। यह अनदख्े ाी इसलिए हुई, क्यांेि क चार-छह विधायक किन्ही कारणो ं से असंताष्े ा ग्रस्त हो जाते हैं और फिर वे अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ माहौल बनाने लगते हैं। जब ऐसा होता है तो विपक्षी राजनीतिक दल अवसर का लाभ लेने की हरसंभव कोशिश करते हैं। अपने विधायकों की बगावत के बाद कांग्रेस भाजपा पर उन्हें तोड़ने, लालच देने का आरापे लगा रही है, लेकिन उसे बताना चाहिए कि वह अपन े विधायका ें को नियंत्रण मे ं क्यां े नही ं रख सकी? क्या कारण है कि बागी विधायक भाजपा से मिलकर अपनी ही सरकार के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं?

आज जो कुछ उत्तराखंड मे ं हा े रहा है वह अन्य अनके छोट े राज्यां े में े पहल े भी हा े चुका है। एक समय गोवा उन्ही ं कारणो ं से राजनीतिक अस्थिरता से लंब े समय तक ग्रस्त रहा जिन कारणो ं से उत्तराखंड ग्रस्त है। कुछ ऐसी ही कहानी झारखंड की भी रही है। इसके अलावा पूर्वोतर के राज्य भी रह-रहकर राजनीतिक अस्थिरता से जूझते रह े हैं। कुछ ही दिनां े पहल े अरूणाचल प्रदेश मे ं कांग्रेस विधायका ें के असंताष्े ा के कारण ही सत्ता परिवर्तन हुआ।

स्पष्ट है कि यदि समस्या के मूल कारणो ं का निवारण नहीं किया जाएगा ता े छोट े राज्यां े को राजनीतिक अस्थिरता से बचाना मुश्किल है। चुनाव के बाद चदं विधायका ें के तथाकथित असंताष्े ा के कारण नेतृत्व परिवर्तन अथवा सत्ता परिवर्तन न हा े सके, इसके लिए राजनीतिक सुधारो ं की दिशा मे ं आगे बढ़ने की आवश्यकता है। यह आवश्यकता इसलिए भी है, क्यांेि क दलबदल विराध्े ाी कानून मे ं संशाध्े ान के बावजूद बात बन नही ं रही है। दलबदल विराध्े ाी कानून की विधानसभा अध्यक्ष अपने हिसाब से व्याख्या करते है। कई बार उसे सतत प्रक्रिया करार दिया जाता है। दलबदल के मामले में विधानसभा अध्यक्ष के फैसले की जब तक कानूनी समीक्षा होती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उत्तराखंड और इसके पहल े अरूणाचल प्रदेश मे ं राजनीतिक सुधारो ं की जरूरत है। बेहतर हागे ा कि जैसे राजनीतिक सुधार आवश्यक हा े चुके हैं उन्हें पूरा करने के लिए कदम उठाए जाएं ताकि जनादेश की मनमानी व्याख्या को भी रोका जा सके और राजनीतिक अस्थिरता की समस्या का भी समाधान किया जा सके।