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May 23rd
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भारतीय कृषिः समस्याएं व समाधान

हाल ही में आई एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि भारत चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बन गई है। परन्तु यह संवृद्धि भारत की 800 करोड़ से ज्यादा ग्रामीण जनसंख्या के जीवन स्तर में भी झलकनी चाहिए, जिनकी हालत उतनी बेहतर नहीं है जितनी के आजादी के 65 साल बाद होनी चाहिए थी।

2003 से 2013 के मध्य ग्रामीण भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में स्पष्ट बदलाव देखा गया था, परन्तु 11 वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि वृद्धि दर 4 प्रतिशत रही, वही 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) के प्रथम तीन वर्षों में यह दर घटकर मात्र 1.7 प्रतिशत पर आ गई जो निश्चित ही चिन्ता का विषय है। 3 लाख से अधिक किसान पिछले एक दशक में आत्महत्या कर चुके है। अकेले महाराष्ट्र में पिछले वर्ष 2000 किसानों के आत्महत्या करने की बात सामने आई है। दुर्भाग्य से भारत पिछले कई वर्षों से सुखे की समस्या से जुझ रहा है। देश में 302 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया हैं। चूंकि कृषि भारत में आधी से अधिक ग्रामीण जनंसख्या को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अपने से जोड़े हुए है अतः मानसुन की असफलता छोटे किसानों तथा गरीब खेतिहर मजदुरों के लिए एक गंभीर संकट बनकर सामने आती है।।

बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था -

वल्र्ड बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट-2008 में यह बताया गया है कि तीव्र कृषि विकास की दर गरीबी उन्मुलन की गैर कृषि योजनाओं से दोहरी मददगार साबित होती है। 2011-12 के अनुसार ग्रामीण भारत के 80 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे। शहरी इण्डिया तथा ग्रामीण भारत में निरन्तर बढ़ती आय तथा उपभोग की असमानता निश्चित ही हाल ही के वर्षों में एक बड़ी चिन्ता का विषय बनकर उभरी है।

हाल ही में हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि कमोडिटी (वस्तुओं तथा जिसे) की कीमतों और कृषि के लिए व्यापार की अनुकुल होती व्यापार शर्तों के कारण 2005-2012 के बीच ग्रामीण भारत की आय में बढ़ोतरी हुई है परन्तु यह बढ़ोतरी आज भी गैर कृषि कार्यों की तुलना में 3 गुणा कम है।

भारत में 90 प्रतिशत से अधिक कृषक छोटे एवं सीमान्त कृषकों की श्रेणी में आते हैं जो देश की 50 प्रतिशत कृषि भूमि पर खेती करते हैं। इन गरीब तथा अशिक्षित किसानों को जबरन अपनी घरेलु आय बढ़ाने की मंशा से गैर कृषि कार्यों में खपने पर विवश होना पड़ रहा है। राष्ट्रीय नमुना सर्वेक्षण (2011-12) के 68वें दौर के आकड़ों में पता चलता है कि लगभग 36 करोड़ कृषि श्रमिकों ने 2004-12 के बीच गैर कृषि कार्यों के लिए कृषि को छोड़ दिया है। आजादी के बाद यह पहली बार देखा गया है कि भारत की कुल जनसंख्या की कृषि रोजगार में सलंग्नता गिरकर 50 प्रतिशत से नीचे आ गई है। कृषि कार्य में रोजगार की गुणवत्ता का गिरना भी कई पर्यवेक्षकों की नजर में किसानों के मोहभंग का एक कारण बनकर सामने आया है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने पिछले एक दशक में प्रतिवर्ष लगभग 5 करोड़ ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध करवाया है। यद्यपि 2012 के पश्चात इससे होने वाले लाभान्वितों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

सार्वजनिक निवेश का महत्व

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक तरफ रोजगार में गुणवत्ता की कमी का, तो दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन से होने वाली कृषि गत समस्याओं का एक साथ सामना कर रही है। अतः माना जा रहा है की ग्रामीण विकास तथा कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए सार्वजनिक निवेश एक कुंजी की तरह कार्य करेगा। भूमि उपयोग सम्बन्धी सरकारी आकड़े बताते है कि भारत में खेती योग्य भूमि का 55 प्रतिशत हिस्सा आज भी सिंचाई की सुविधा से वंचित है। मौसमी पेटर्न में हो रहे बदलाव ने भारतीय कृषक की समस्याओं को और भी अधिक बढ़ा दिया है। पिछले तीन दशकों से जल ग्रहण परियोजनाओं से पता चलता है कि वर्षा के जल का स्थानिक संरक्षण फसलों को सूखें से तथा किसानों को कृषिगत असुरक्षा में बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। अतः मनरेगा के तहत वाटरशेड कार्यक्रमों द्वारा वर्षा जल को संचित किए जाने की आवश्यकता है। चूंकि वर्षा पर निर्भर फसलें दाले, मोटे अनाज तथा तिलहन से हमारी खाद्यान्न आवश्यकताओं की 40 प्रतिशत पूर्ति होती है। अतः संचित वर्षा जल को सिंचाई का पूरक बनाने से खाद्य सुरक्षा में भी मदद मिलेगी। मृदा एक अन्य महत्वपूर्ण कृषि घटक है जहां पर निवेश किए जाने की आवश्यता है। भारतीय मृदा में कार्बनिक पदार्थों/तत्वों का स्तर अपेक्षाकृत कम पाया जाता है। रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण भी मृदा स्वास्थ्य में गिरावट आई है।

सरकार द्वारा दिए जा रहे उर्वरक अनुदान के कारण मृदा स्वास्थ्य की समस्या और भी गम्भीर हो गई है। यद्यपि पर्यावरण तथा मुनष्य जाति पर रासायनिक उर्वरकों के पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों पर जन जागरूकता में वृद्धि हुई है परन्तु भारत में दुनिया कें अन्य भागों की तुलना में अभी भी किटनाशकों का अत्यधिक उपयोग अवश्य चिन्ता का विषय है, अतः तत्काल रूप से गैर कीटनाशी प्रबन्धन तकनीकों यथा जैविक कृषि का प्रयोग किए जाने की महत्ती आवश्यकता जान पड़ती है।

फसल विविधता को बढ़ावा देना -

मानसून का जुआ मानी जाने वाली भारतीय कृषि के विकास में फसल विविधिकरण एक और बड़ी चुनौती है। फसल पेर्टन को बदलते हुए दलहनी फसलों को बौना जहां देश की अधिकांश शाकाहारी लोगों की प्रोटीन की पूर्ति में सहायक होगा वहीं दूसरी तरफ मक्का एवं बाजरा जैसे मोटे अनाजों की कृषि शुष्क क्षेत्रों में करना किसानों के लिए भी फायदे का सौदा साबित होगी।

दालों तथा बाजरे की फसल का निम्न न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएससपी) तथा सरकारी खरीद की कोई उचित व्यवस्था ना होने के चलते इनके उत्पादन के लिए किसान हतोत्साहित हुए हंै। हाल ही में मध्यप्रदेश जैसे राज्यों ने अपनी फसल खरीद नीति को विविधता प्रदान करते हुए दालों तथा बाजरा जैसी मोटी फसलों की खरीद शुरू की है जो निश्चित तौर पर मध्यान्ह भोजन योजना (एमडीएम) तथा एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (आईसीडीएस) के द्वारा बच्चों किशोरियों तथा गर्भवती महिलाओं को पूरक पोषण प्रदान करने में सहायता करते हुए उन्हें रक्ताल्पता तथा कुपोषण से बचाएंगे।

कृषि अनुसंधान विविध फसलों को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है परन्तु दुर्भाग्य से हमारे देश में सकल घरेलु उत्पाद का मात्र 0.7 प्रतिशत ही कृषि अनुसंधान पर खर्च किया जाता है। अतः देश में कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए मोटे अनाजों को चार गुणा बढ़ाए जाने की सम्भावना है। जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटते हुए सुपोषित खाद्यान्नों की प्राप्ति खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के क्रम में की जा सके। कृषि वैज्ञानिकों तथा सार्वजनिक वित्त ने भारतीय कृषि को आधुनिक तथा अधिक उत्पादक बनाने में महत्ती भूमिका निभाई है। परन्तु अब यह समय की मांग है कि कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेन्सी (एटीएमए) तथा कृषि विज्ञान केन्द्र ग्रामीण स्तर पर अपनी भूमिका बढ़ाए। ग्रामीण भारत में रोजगार भी एक बड़ी समस्या हैं। अनुमान बताते है कि गैर कृषि कार्य में रोजगार वृद्धि पर बढ़कर प्रतिवर्ष 5.6 लाख हो गई है। हमें इस बढ़ते गैर कृषि रोजगारों को ग्रामीण भारत तक ले जाना होगा ताकि गांधी के ग्राम भी उच्च संवृद्धि दर प्राप्त करके तेजी से विकसित हो रही भारतीय अर्थव्यवस्था का लाभ प्राप्त करते हुए बेहतर जीवन यापन कर सके।

हमें कृषि प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देते हुए कृषि उपजो का मूल्य वर्द्धन करना होगा ताकि स्थानीय कृषि उत्पादकों को उनके कच्चे माल का उचित मूल्य मिल सके। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि यद्यपि समग्र ग्रामीण महिला रोजगार सलंग्नता में कमी आई है परन्तु गरीब परिवारों की महिलाओं की रोजगार सलंग्नता मनरेगा की वजह से बड़ी है जो मनरेगा को पुनर्जीवित करने की महत्ता को रेखांकित करता है।