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May 23rd
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धारा-377 पर विवाद

समलैंगिक सम्बन्धों से सम्बन्धित भारतीय दण्ड संहिता की धारा-377 पर पुनः विचार करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त मामले को 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ के हवाले कर दिया है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा-377 में अप्राकृतिक यौनाचार तथा समलैंगिक सम्बन्धों को अपराध माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला गैर-सरकारी संगठन नाज फाउण्डेशन तथा अन्य 8 पुर्नविचार याचिकाओं पर दिया।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा-377 में अप्राकृतिक यौनाचार को संज्ञेय तथा गैर जमानती अपराध माना गया है अतः उक्त विवाद के निपटारे की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह आशा की जा रही है कि 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ कानून, मूलकर्तव्यों तथा मूल अधिकारों की रक्षक की भूमिका निभातें हुए लोक कल्याणकारी फैसला सुनाएगी। उक्त मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने 2005 के अपने फैसले में यह कहा था की वयस्कों मे सहमति से बने यौन सम्बन्धों को वैधानिक माना जाएगा। तत्पश्चात् 2013 में अपने पास आई, हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका में शीर्घ अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक सम्बन्धों की पैरवी करने वालों की यह दलील खारिज कर दी थी की धारा-377 के आधार पर एलजीबीटी समुदायों को ब्लैकमेल और प्रताडि़त किया जाता है। इस पर अनेक भारतीयों की इस मानसिकता को धक्का लगा था की, भारत में औपनिवेशिक मानसिकता गायब हो गई है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर बहस व विचार विमर्श करने के लिए विधायिका को कहा था। परन्तु अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों का संरक्षण करना व उनके हितों की सुरक्षा करना विधायिका से अधिक न्यायपालिका का कर्तव्य समझा जाता है।

अनेक ऐसे मुद्दें है जो संसद में विचारणीय तथा अदालत में विचाराधीन है परन्तु समाज के छोटे वर्गों के हितों की सुरक्षा के लिए यह जरूरी होगा की उनकी जनसंख्या की बजाय उनकी दलीलों पर गौर किया जाए। धारा-377, अल्पसंख्यक मुद्दों के अलावा भी राजनीति तथा कानून की विडम्बनाओं से प्रभावित होगी इसमें कोई संदेह नहीं अतः कहा जा सकता है कि जिस प्रकार समानता बनाम भेदभाव मामलें इलाकों में जैसे जाति, रंग, धर्म तथा लिंग से आधारस्तम्भ बनकर उभरा था इसमें भी अपनी महत्ता कायम रखेगा। कानून अचल व अडिग होते है परन्तु समय व बदली हुई परिस्थितियों के साथ उन पर पुर्नविचार किया जाना चाहिए। धारा-377 पर हो रही सार्वजनिक बहस से पता चलता है कि, समाज इस पुराने लंबादे को उतारना अधिक पसंद करेगा।