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भारत का पहला सफल गर्भाशय प्रत्यारोपण

पुणे स्थित गैलेक्सी केयर लेप्रोस्कोपीक इंस्टीट्यूट (Galaxy Care Laparoscopy Institute - GCLI) के डाॅक्टरों की टीम ने 18 मई, 2017 को सोलापुर की रहने वाली 21 वर्षीय एक महिला का सफलतापूर्वक गर्भाशय प्रत्यारोपण किया।

यह भारत का पहला सफल गर्भाशय प्रत्यारोपण है। गर्भाशय दानकर्ता, प्राप्तकर्ता की 43 वर्षीय मां थी। प्राप्तकर्ता महिला के शरीर में उसके जन्म से ही गर्भाशय मौजूद नहीं था। यह सर्जरी साढ़े आठ घंटों तक चली। डाॅ. शैलेश पुनतांबेकर (Dr. Shailesh Puntambekar) के नेतृत्व में 12 डाॅक्टरों के दल ने इस प्रत्यारोपण को संपन्न किया।

इसके एक दिन बाद 19 मई, 2017 को डाॅक्टरों की इसी टीम द्वारा बड़ौदा निवासी एक महिला का भी गर्भाशय प्रत्यारोपण किया गया, यह भारत का दूसरा गर्भाशय प्रत्यारोपण था। इसमें रोगग्रस्त गर्भाशय वाली 24 वर्षीय महिला में उसकी 45 वर्षीय मां द्वारा प्राप्त गर्भाशय लगाया गया। इस दूसरे गर्भाशय प्रत्यारोपण में लगभग सात घंटे का समय लगा। विश्व में यह पहली बार है जब दोनों प्रत्यारोपण ‘न्यूनतम पहुंच लैप्रोस्कोपिक सर्जरी’ (Minimal Access Laparoscopic Surgery) के माध्यम से किए गए।

गर्भाशय प्रत्यारोपण द्वारा इस प्रकार के बांझपन का उपचार संभव है तथा इस प्रत्यारोपण ने बहुत सी ऐसी महिलाओं को आशा की किरण दी है जो इस प्रकार के बांझपन से ग्रसित हैं। उल्लेखनीय है कि गर्भाशय प्रत्यारोपण एक शल्यचिकित्सा प्रक्रिया है, जिसके द्वारा दाता के शरीर से गर्भाशय को निकाल कर ऐसे प्राप्तकर्ता में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है जिसमें गर्भाशय अनुपस्थित या रोगग्रस्त हो। यह बांझपन के लिए एक संभावित उपचार है।

दुनिया में केवल कुछ ही गर्भाशय प्रत्यारोपण किये गए हैं जिनमें से सभी सफल प्रत्यारोपण स्वीडन में ही हुए हैं। स्वीडन में ही विश्व का पहला ऐसा सफल प्रत्यारोपण वर्ष 2013 में हुआ था जिससे पहली बार सितंबर 2014 में एक बच्चा जन्मित हुआ। अब तक दुनिया भर में 25 गर्भाशय प्रत्यारोपण किए गए हैं। स्वीडन के गाॅटेनबर्ग विश्वविद्यालय में प्रसूति और स्त्री रोग विभाग के प्रोफेसर डाॅ. मैट ब्रानस्ट्रम (Dr. Mats Brannstrom) के अनुसार गर्भाशय प्रत्यारोपण के बाद अभी तक केवल 6 बच्चों का ही जन्म हुआ है जिनमें एक ही मां के दो बच्चे शामिल हैं।

ब्रानस्ट्रम के नेतृत्व में ही डाॅक्टरों की एक टीम द्वारा किये गए प्रत्यारोपण के बाद पहली बार 2014 में सफलतापूर्वक एक स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ था, 11 असफल प्रयासों के बाद ऐसा संभव हो पाया था।

गर्भाशय प्रत्यारोपण में सबसे बड़ा जोखिम प्राप्तकर्ता के शरीर द्वारा प्रत्यारोपित आॅर्गन को अस्वीकृत किये जाने का होता है जिसमें प्राप्तकर्ता की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) प्रत्यारोपित अंग पर हमला कर देती है। इसलिए भारत में हुए इन दोनों प्रत्यारोपणों द्वारा बच्चे का जन्म हो पाएगा अथवा नहीं, अभी यह देखना शेष है।

 
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